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Jivan Ek Avsar Hai — Osho
फूल तो नृत्य है अस्तित्व के।
फूल तो आकांक्षा है, पृथ्वी की आकाश के तारों को छू लेने के लिए।
लेकिन जो बीच ही रह जाए। वह अभागा है।
हुआ भी और ना भी हुआ। व्यर्थ ही हुआ।
होने और ना होने में क्या भेद।
अगर बीच ही रह जाना है तो ना भी होते तो भी चल जाता।
अंतर तो तब पड़ेगा, जब वसंत आएगा।
अंतर तो तब पड़ेगा जब फूल हवाओं में और सूरज की किरणों में नाचेंगे।
अंतर तो तब पड़ेगा जब मधुमक्खियाँ और तितलियाँ उनके पास गीत गाएँगी।
उस रास से अंतर पड़ेगा।
फूल की बांसुरी पर जब पक्षी अपनी धुन बिठाने लगेंगी तब बीज को पता चलेगा कि मैं वस्तुतः क्या था।
वह नहीं था जो दिखाई पड़ता था, वह था जो कभी दिखाई नहीं पड़ता था, दृश्य नहीं था, अदृश्य था।